नोटबंदी के बाद लंबी लाइनों के लिए मोदी नहीं, हम जिम्मेदार हैं

15 अगस्त 1947 को हम आजाद हुए थे लेकिन आज 2016 के हालात ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम सचमुच आजादी के अधिकारी थे? आइए, आज उन परिस्थितियों पर बात करते हैं जिन्हें महसूस करके मुझे अपनी ‘आजादी’ पर सवाल उठाना पड़ रहा है:




1000 और 500 के पुराने नोट बैन हुए 1 महीने से अधिक का समय बीत चुका है। जब विमुद्रीकरण का यह फैसला आया था तो मन में उम्मीद थी कि लगभग 1 महीने में सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन हालात जैसे तब थे, आज भी वैसे ही हैं। वही लंबी-लंबी लाइनें, अपनी सब्जी की दुकान बंद करके बैंकों के बाहर सुबह से शाम तक खड़ा रहने के बावजूद खाली हाथ वापस लौटने वाला वही मायूस बुजुर्ग, कैश की कमी के चलते अपनी दुकान के लिए सामान न खरीद पाने के कारण दुकान बंद करके घर में बैठकर सुबगती वह विधवा महिला…. सब कुछ वैसा ही। लेकिन इन सबके लिए जिम्मेदार कौन है? नरेन्द्र मोदी? भारत सरकार? रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया? उर्जित पटेल? या फिर सरकार को विमुद्रीकरण की राय देने वाले लोग? सही मायनों में देखा जाए तो आज के हालातों के लिए इनमें से कोई भी जिम्मेदार नहीं है। आज के हालातों के लिए ‘हम’ यानी आम आदमी जिम्मेदार है। बताता हूं ऐसा क्यों और कैसे।

क्या आपने कभी सोचा है कि जिन लोगों के पास से करोड़ों रुपए के नए नोट पकड़े जा रहे हैं, उनके पास ये नए नोट आए कहां से? उन तक नए नोट नरेन्द्र मोदी या आरबीआई ने तो नहीं पहुंचाए होंगे। तो फिर उन लोगों के पास नए नोट आ कहां से रहे हैं? नए नोट सरकार ने मुख्य रूप से बैंकों और पोस्ट ऑफिसों को उपलब्ध कराए थे। यानी सीधी सी बात है कि नए नोटों को आम आदमी तक ना पहुंचा कर चंद पैसों या संबंधों के कारण बैंक और पोस्ट ऑफिस वाले गलत हाथों में पहुंचा रहे हैं। इस बात का अनुभव मैंने खुद किया है।

9 नवंबर को रुद्राभिषेक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए घर जाना हुआ। कार्यक्रम में होने वाले खर्चों के लिए घर में कैश की व्यवस्था की गई थी। 10 को एक भंडारे का भी आयोजन था। इस तरह के कार्यक्रमों में बहुत छोटी-छोटी चीजें खरीदनी होती हैं। लेकिन पुराने नोट बैन होने की वजह से उन चीजों को संबंधों के आधार पर उधार ही खरीदना पड़ा। इन सभी खर्चों को लेकर मेरे बाबा जी काफी परेशान थे। 11 नवंबर को आयोजित भंडारे में शामिल होने के लिए मेरे एक दूर के रिश्तेदार जो कि एक पोस्ट ऑफिस में पोस्टमास्टर हैं, वह भी आए हुए थे।

उनके सामने जब इस विषय को लेकर चर्चा होने लगी तो वह बाबा जी से बोले, ‘अरे चाचा, आप बताइए कि कितने के नए नोट चाहिए। कल से आज तक में 40 लाख रुपए अपने परिचितों को बदल कर दे चुका हूं।’ उनके अलावा बैंक में कार्यरत मेरे कई मित्रों सहित रिश्तेदार तक इसी तरह के ऑफर्स दे चुके हैं। एक बात तो साफ है कि जिन लोगों ने कैश के रूप में अपना ब्लैकमनी घर में रखा था उन्होंने साम, दाम, दंड का प्रयोग करके उसे वाइट कर लिया है और लगातार कर रहे हैं। नए नोटों को वे पुरानी तरह से ही अपने घर में छिपाकर रखेंगे और आप एटीएम और बैंक की लाइन में लगे रहेंगे।

जो लोग इस तरह के गलत कामों में शामिल हैं (बैंक और पोस्ट ऑफिस के कर्मचारी) वे भी आम आदमी ही हैं। लेकिन वे आपका हक मारकर अपनी पॉकेट भरने और संबंध बनाने में लगे हैं। लेकिन हम पीएम को जिम्मेदार मानते हैं। एक बार कल्पना करिए कि हम पर अंग्रेजों का शासन था, भारत उनका देश नहीं लेकिन उनका बनाया हावड़ा ब्रिज आज तक वैसे ही खड़ा है। लेकिन जो पुल भारत सरकार ने अपने ही देश के ठेकेदारों से बनवाए उनके टूटने की खबर हमें मीडिया के माध्यम से मिलती ही रहती है। हमने और आपने व्यक्ति के रूप में भले ही कितना ही विकास कर लिया हो लेकिन एक राष्ट्र के रूप में, एक देश के रूप में हम जहां थे, उससे और भी पीछे चले गए और यही कारण है कि कतारों में आम लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। भले ही आप किसी तरह का भ्रष्टाचार ना कर रहे हों लेकिन हमारे आपके ‘अपने’ ही देश को पीछे, बहुत पीछे ले जाने में लगे हैं।

मेरा देश बदल रहा है लेकिन वह सकारात्मक दिशा में नहीं जा रहा। मेरे देश को पीछे ले जाने में हमारे अपने लोग ही लगे हुए हैं और हम चुपचाप देखते रहते हैं। आखिर हम कर भी क्या सकते हैं? हम सिर्फ सरकार को, उसकी नीतियों को गलत बताकर गालियां दे सकते हैं। याद रखिएगा, जब तक मैं और आप नहीं बदलेंगे, तब तक ‘अच्छे दिन’ नहीं आने वाले।

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