हिंसा और दमन के जरिये राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करना है वामपंथ का असल चरित्र

केरल हमेशा से राजनीतिक हिंसा के लिए कुख्यात रहा है। आये दिन वहां राजनीतिक दलों के आम कार्यकर्ता इन हिंसा के शिकार हो रहे हैं। केरल में अक्सर हर तरह की राजनीतिक हिंसा में अक्सर एक पक्ष मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ही होती आई है| चाहे आज़ादी के पहले त्रावनकोर राज्य के विरुद्ध एलप्पी क्षेत्र में अक्टूबर 1946 को हुआ कम्युनिस्टों का हिंसक पुन्नापरा-वायलर विद्रोह हो, जिसमें हजारों की तादाद में आम पुलिस वाले एवं जनसामान्य मारे गए थे तथा जिसे तात्कालीन कम्युनिस्ट नेता टी के वर्गीश वैद्य ने “कम्युनिस्ट इंडिया” बनाने का पूर्वाभ्यास तक कह डाला था, या फिर विश्व की प्रथम लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी 1957 की कम्युनिस्ट नम्बूदरीपाद सरकार में शुरू हुयी व्यापक राजनैतिक हिंसा, जिसमें विपक्ष के नेताओं और कार्यकर्ताओं को चुन चुन कर मारा जाने लगा|

समस्या इतनी गंभीर हो गयी कि सन 1959 में तात्कालीन कांग्रेस नीत केंद्र सरकार को राज्य में संवैधानिक ढांचे के टूटने एवं कानून व्यवस्था समाप्त हो जाने के आरोप में अनुच्छेद 356 का प्रयोग कर, लिबरेशन स्ट्रगल कर रहे सामान्य केरल वासियों की मांग को मानते हुए नम्बूदरीपाद सरकार को बर्खास्त करना पड़ा। इस तरह विश्व की एक मात्र जनतांत्रिक तरीके से चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार भी हिंसा के उसी मार्ग पर चल पड़ी, जहाँ इंसान का मूल्य विचारधारा एवं राजनैतिक हितों के समक्ष गौण हो जाता है।

जो भी स्टालिन की नीतियों के विरुद्ध होता चाहे वो उसकी खुद की ही पार्टी का क्यों न हो, उसकी हत्या कर देना ही उसका राजधर्म बन गया। स्टालिन ने अपनी विचारधारा जो कि स्टालिनवादी थी, का प्रचार शुरू किया। भारत के मार्क्सवादी इसी परंपरा के वाहक हैं।

वे राजनीती में सत्तासीन होने के लिए स्टॅलिन की ही तरह हिंसा, क़त्ल एवं वैचारिक तानाशाही को प्रमुखता देते हैं। और तो और सत्तासीन होने के बाद भी अगर कोई उनकी नीतियों से इतर सोचता है या उस सरकार के शीर्ष नेतृत्व को चुनौती देने में सक्षम हो जाता है तो स्टालिन की ही तरह ये भी उसे हमेशा के लिए शांत करने से नहीं चूकते।
केरल में सत्तारूढ़ मार्क्सवादी सरकार विश्व की एक मात्र सरकार या यों कहें एक मात्र राजनैतिक विचारधारा वाली पार्टी है, जो अब तक क्रूर दमनकारी एवं हिंसक राजनीतिज्ञ स्टालिन को अपना राजनैतिक आदर्श मानती है।

जहाँ सम्पूर्ण विश्व अब लगभग ये बात मान चुका है कि स्टालिन की नीतियाँ सभ्य राजनैतिक व्यवस्था में कोई स्थान न रखती है और न ही उसका कोई स्थान होना चाहिए, वहीँ भारत के मार्क्सवादी आज तक उसे अपना आदर्श बनाये बैठे हैं। अक्टूबर 1917 की रुसी क्रांति से लेनिन के बाद सत्तासीन हुए स्टालिन ने ना केवल मार्क्सवाद की विचारधारा का ही बंटाधार किया बल्कि लेनिन ने जो कुछ मार्क्सवाद बचा रखा था, उसे भी तिलांजलि दे दी। मार्क्स नवीन राष्ट्र-राज्य की अवधारणा के ही खिलाफ थे, उनके अनुसार क्रांति नीचे से स्वतः होनी थी, जबकि स्टॅलिन ने इसे जबरन थोपने का अभियान चलाया। जो भी उसकी नीतियों के विरुद्ध होता चाहे वो उसकी खुद की ही पार्टी का क्यों न हो, उसकी हत्या कर देना ही राज धर्म बन गया।

स्टालिन ने मार्क्स के असल उसूलों के खिलाफ जा कर न केवल तत्कालीन जहरीली वैश्विक कूटनीति का अंग बनना स्वीकार किया अपितु अपनी विचारधारा जो कि मार्क्सवादी तो बिलकुल नहीं, बल्कि स्टालिनवादी थी, का प्रचार शुरू किया। भारत के मार्क्सवादी इसी परंपरा के वाहक हैं। वे राजनीती में सत्तासीन होने के लिए स्टेलिन की ही तरह हिंसा, क़त्ल एवं वैचारिक तानाशाही को ही प्रमुखता देते हैं। और तो और, सत्तासीन होने के बाद भी अगर कोई उनकी नीतियों से इतर सोचता है या उस सरकार के शीर्ष नेतृत्व को चुनौती देने में सक्षम हो जाता है, तो स्टालिन की ही तरह ये भी उसे हमेशा के लिए शांत करने से चूकते नहीं हैं। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में जहाँ भी यह दल “सी.पी.एम.” सक्रिय और मजबूत होता है, वहां ये अपनें इन्ही हिंसक तौर-तरीकों को इस्तेमाल में लाने लगते हैं, चाहे वो बंगाल रहा हो या लगातार लाल हो रही केरल की भूमि।




भारतीय जनसंघ के सन 1967 में हुए कालीकट सम्मलेन के साथ केरल की राजनीति में राष्ट्रवादी विचारधारा का जब से प्रादुर्भाव हुआ है, उसी समय से राष्ट्रवादी विचार के कार्यकर्ता लगातार स्टालिनवादी सी.पी.एम. के शिकार बन रहे हैं।

संघ के मुख्य शिक्षक वदिकल रामकृष्णन की कन्नूर में हुयी हत्या से शुरू हुआ सिलसिला आज तक लगातार जारी है। अकेले केरल में ही सी.पी.एम. हिंसा में मारे गए राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं कि संख्या 227 के लगभग है। अभी हाल ही में 12 अक्टूबर को कन्नूर में मार्क्सवादियों ने सी रेमिथ की हत्या कर दी, इनके पिता उत्थमन की भी हत्या इन्ही तत्वों ने सन 2002 में कर दी थी। इनका गाँव पिन्नाराई, सी.पी.एम. के मुख्यमंत्री का पैतृक ग्राम भी है। जब से मई 2016 में सी.पी.एम. की सरकार केरल में बनी है, तब से राजनैतिक हिंसा एवं हत्याओं का सिलसिला फिर से शुरू हो चुका है। संघ कार्यकर्ताओं पर हमले आम हो गए हैं एवं चार कार्यकर्ताओं की अब तक हत्या भी हो चुकी है। अभी मात्र 2 महीने पूर्व प्रदेश भाजपा के त्रिवेंद्रम स्थित नवनिर्मित कार्यालय पर पेट्रोल बम से हमला भी किया गया। यहाँ पर ही गत 7 अक्टूबर को विष्णु नामक भाजपा युवा मोर्चा के कार्यकर्ता की उसके मां बिंदु और चाची लैला के सामने सी.पी.एम. कार्यकर्ताओं ने हत्या कर दी थी तथा उन्होंने जब विष्णु को बचाने की कोशिश की तो उन्हें भी घायल कर दिया। विष्णु एक संभ्रांत दलित परिवार से ताल्लुक रखता था।

रमज़ान महीने के 29 वें दिन 2014 में सी.पी.एम. कार्यकर्ताओं ने मुस्लिम संगठन SDPI के मुखपत्र तेजस तेली के संवाददाता फैज़ल की सरेआम हत्या कर दी। हत्या के बाद उन्होंने वहां पर त्रिशूल गाड़ कर इसका इलज़ाम संघ कार्यकर्ताओं पर डालकर समाज में राजनैतिक स्वार्थ हेतु वैमनस्य पैदा करने की कोशिश की। जब एक इमानदार पुलिस अधिकारी ने इस साजिश का पर्दाफाश करना चाहा तो उसे प्रताड़ित किया जाने लगा एवं उसका तबादला कर दिया गया। तब जाके फैज़ल के परिवार वालों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया एवं माननीय उच्च न्यायालय ने इस केस को सीबीआई को सौंपा। बाद में सीबीआई के छानबीन में असल आरोपियों की पहचान सी.पी.एम. कार्यकर्ताओं के रूप में हुई, जिसे उच्च न्यायालय ने भी सत्य पाया।

असल में केरल में हर तरह की राजनैतिक हिंसा के पीछे एक हाथ तो सी.पी.एम का होता ही है। केरल में अब फिर से शुरू हुए नवीन राजनैतिक हिंसा के दौर में सी.पी.एम. ने जिहादी तत्वों के साथ हाथ मिला लिया है, दोनों ही विचारधाराएँ संघ कार्यकर्ताओं को अपना आसान निशाना बना रही हैं|

कुल मिला के सी.पी.एम. केरल में मार्क्स नहीं, बल्कि पूर्ण रूप से स्टालिन के पदचिन्हों पर चल रही है और यही कारण है कि जहाँ भी सी.पी.एम. प्रभावशाली है, भारतीय जन सामान्य को वहां पर तब तक गंभीर राजनैतिक हिंसक दौर से गुजरना पड़ रहा है। केरल से व्यापक पैमाने पर ISIS के लिए हुआ पलायन एवं इस मुद्दे पर सी.पी.एम. की अगुवाई वाली वाम मोर्चा के सरकार की अनदेखी तो कम से कम इसी ओर इशारा कर रही है। काफी टालमलोट के बाद ही केरल सरकार ने ISIS के युद्ध क्षेत्र से आये कॉल डिटेल को NIA से साझा किया। अगर व्यापक दृष्टि से देखे तो पाएंगे इन सारे तत्वों का स्वार्थ समाज में अव्यवस्था एवं राष्ट्रवाद के पोषक तत्वों के सफाए में सन्निहित है और चूँकि संघ कार्यकर्ता इस विषैली विचारधारा का लोकतान्त्रिक तरीके से सफलतापूर्वक प्रतिकार कर रहे हैं, इसलिए उन्हें इसकी कीमत अपने कार्यकर्ताओं के खून के रूप में चुकानी भी पड़ रही है। जब तक ये तत्व राजनैतिक रूप से संघर्षग्रस्त इन क्षेत्रों में गौण नहीं हो जाते तब तक हिंसा के इस सतत चल रहे सिलसिले के थम जाने की संभावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती है। अब ये वहां की जनता को ही निश्चित करना होगा कि वो किस तरह की राजनैतिक व्यवस्था चाहते हैं।

क्या शान्ति के साथ चलने वाले लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकल्प हिंसक स्टालिन को माने वाले सी.पी.एम. या जिहादी तत्व हो सकते हैं ? सब कुछ वहां की जनता के निर्णय पर निर्भर है कि उन्हें शांत सुरभित लोकतंत्र या फिर समाज में सतत संघर्ष चाहने वाली वाम विचारधारा इनमें से क्या चाहिए ? सभ्य समाज को इन तत्वों को अब नकारना ही पड़ेगा।

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