सांप्रदायिक हिंसा की आग में जल रहा है बंगाल, खामोश क्यों है मीडिया ?

पुलिस अधिकारी ने कहा, “पुलिस ने वहां पहुंचकर हालात को सामान्य किया और भीड़ को तितर-बितर किया। लेकिन उसके दो घंटे बाद वहां हालात बिगड़ गए। दोनों पक्षों के दंगाई आमने-सामने हो गए और पुलिस से भी उलझ गए। वे लोग बम लेकर आए थे। हमलोगों ने आंसू गैस के गोले छोड़े। अंत में हमें हालात पर काबू पाने के लिए बल का प्रयोग करना पड़ा।”



देश के तमाम मीडिया Houses इस ख़बर को धार्मिक चश्मे से देख रहे हैं, और इसीलिए ये तमाम चैनल या अख़बार इन ख़बरों के मामले में Selective हो जाते हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या किसी हिंसक घटना को धर्म के चश्में से देखकर अनदेखा कर देना जायज़ है। क्या इस बड़ी ख़बर को नज़रअंदाज़ कर देने से ये समस्या खत्म हो जाएगी?

इस हिंसा की शुरुआत कैसे हुई?
12 अक्टूबर को हिंसा की शुरुआत पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना ज़िले से हुई, जहां कथित तौर पर मुहर्रम के जुलूस में एक low-intensity का बम फेंका गया। हालांकि इसमें कोई जख्मी नहीं हुआ, लेकिन इसके बाद हिंसक भीड़ ने हिंदुओं के घरों को जला दिया। और देखते ही देखते हिंसा की ये आग 5 ज़िलों में फैल गई।

अभी पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना, हावड़ा, पश्चिमी मिदनापुर, हुगली और मालदा जिले हिंसाग्रस्त हैं। अब आपको इस पूरी घटना के पीछे छिपी हुई राजनीति भी बता देते हैं। क्योंकि इस राजनीति को समझे बिना आप इस पूरी घटना को समझ नहीं पाएंगे। पिछले हफ्ते ही पश्चिम बंगाल सरकार को कलकत्ता हाईकोर्ट से फटकार लगी थी। अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार पर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाया था।

गौरतलब है कि 11 अक्टूबर को विजयदशमी के दिन दिन देवी दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। विजयदशमी के अगले दिन यानी 12 अक्टूबर को मुहर्रम का त्यौहार था। लेकिन इससे पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने आदेश दिया था कि 11 अक्टूबर को शाम 4 बजे के बाद मूर्ति विसर्जन नहीं होगा। सरकार के इस आदेश के खिलाफ कुछ लोग कलकत्ता हाईकोर्ट गए तो अदालत ने सरकार को जमकर फटकार लगाई और सरकार के इस आदेश को रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि पहले कभी भी मूर्ति विसर्जन पर इस तरह की पाबंदियां नहीं लगाई गईं। अपने आदेश में अदालत ने ये भी कहा था कि राज्य सरकार बहुसंख्यकों की कीमत पर अल्पसंख्यकों को खुश करने की साफ- साफ कोशिश कर रही है।

अदालत का ये भी कहना था कि सरकार को इस बात का एहसास होना चाहिए कि राजनीति के साथ धर्म को मिलाना खतरनाक हो सकता है। यानी राजनीति और धर्म के कॉकटेल से वोटों का नशा होता है और हमारे नेता वर्षों से इसी नशे में झूम रहे हैं। अदालत के इस फैसले के बाद पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार की खूब किरकिरी हुई थी। इसीलिए अब ये सवाल उठ रहा है कि क्या पश्चिम बंगाल की सरकार ने जानबूझकर, एक पक्ष को खुश करने के लिए या मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए कानून-व्यवस्था की अनदेखी की? या फिर ये मान लिया जाए कि पश्चिम बंगाल सरकार सबकुछ जानते और समझते हुए भी कानून व्यवस्था को बनाए रखने में फेल हो गई?

गौरतलब है कि इसी वर्ष की शुरुआत में 3 जनवरी को पश्चिम बंगाल के मालदा में हिंसा हुई थी। और उस वक्त भी देश के न्यूज़ चैनलों ने मौन व्रत धारण कर लिया था। दबी हुई खबरों को उजागर करना हमारी संपादकीय नीति है और इसी के तहत हमने आपको नफरत की आग में सुलगते मालदा का पूरा सच दिखाया था।

उस वक्त हमारे देश के डिज़ाइनर पत्रकार उत्तर प्रदेश के दादरी में हुई अखलाक की हत्या पर देश का माहौल खराब बताने में तुले हुए थे। लेकिन इन बुद्धिजीवियों और डिज़ाइनर पत्रकारों ने मालदा की घटना को उस गंभीरता से नहीं देखा, जैसा कि अखलाक की हत्या को देखा था। और करीब 10 महीनों के बाद भी देश का ये Trend बदला नहीं है। आज भी हमारे देश के तमाम डिज़ाइनर पत्रकार धार्मिक चश्मा पहनकर संपादकीय फैसले लेते हैं।

इस हिंसा को देखकर मन में एक सवाल उठता है कि आखिर वो कौन सी वजह है जिससे भीड़ हिंसक हो जाती है और वो कौन से लोग हैं जो भीड़ का इस्तेमाल अपने अनैतिक हित साधने के लिए करते हैं? हिंसक भीड़ के मनोविज्ञान पर आधारित अलग अलग रिसर्च में ये साबित हुआ है कि भीड़ का अपना कोई दिमाग नहीं होता। कुछ लोग मिलकर पूरी भीड़ की मानसिकता तय करते हैं। भीड़ को उकसाने के लिए सिर्फ एक अफवाह उड़ाना ही काफी होता है यानी भीड़ बिना सोचे समझे किसी भी अफवाह को सच मान सकती है। हर भीड़ में कुछ असामाजिक तत्व होते हैं जो भीड़ को गैरकानूनी रुख अपनाने और हिंसा फैलाने के लिए उकसाते हैं। भीड़ में ज़्यादातर वो युवा होते हैं जो सिस्टम को चुनौती देने के लिए हिंसा पर उतारू हो जाते हैं।

जिन लोगों ने अपनी ज़िंदगी में कभी चींटी भी नहीं मारी होती। वो लोग भीड़ में शामिल होकर हिंसक हो जाते हैं और भीड़ में शामिल होकर तोड़फोड़ आगजनी और हत्या तक करने में नहीं हिचकते दरअसल भीड़ में हर इंसान वहीं करना चाहता है जो दूसरे लोग कर रहे होते हैं। भीड़ में शामिल लोगों को लगता है कि जो अपराध वो अकेले नहीं कर सकते, वो भीड़ में शामिल होकर कर सकते हैं। क्योंकि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता। तो ऐसे में क्या ये मान लिया जाए कि हिंसक प्रदर्शन अपनी जायज़ या नाजायज़ मांगों को मनवाने का सबसे बेहतर तरीका है ? इस सवाल का जवाब है नहीं।

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