अभी न होती नोटबंदी तो 2025 तक बर्बाद हो जाता देश : बड़े अर्थशास्त्री

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर की रात आठ बजे इस बात का एलान किया था कि रात 12 बजे से 500 और 1000 के नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे। इस एलान के साथ ही लोगों के होश उड़ गए थे।




खासतौर पर उन लोगों की परेशानी बढ़ गई थी। जिन्‍होंने करोड़ों अरबों रुपए की काली कमाई दबाकर अपने पास रखी हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के इस फैसले से देश की एक बड़ी आबादी काफी खुश हुई थी। जबकि चंद लोगों की नाराजगी भी देखने को मिली थी और अब भी मिल रही है।

लोग ये सवाल कर रहे थे कि क्‍या प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का फैसला बेहद जल्‍दबाजी में लिया उसकी प्‍लॉनिंग क्‍यों नहीं की गई। नोटबंदी को लेकर तमाम सवालों के जवाब लगातार सरकार की ओर से मिलते रहे हैं। लेकिन, अब इस मामले में एक और सनसनीखेज खुलासा हुआ है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले पर भले ही तमाम राजनीतिक दल सवाल उठा रहे हों, लेकिन देश के बड़े अर्थशास्त्री अनिल बोकिल की टीम का दावा है कि अभी नोटबंदी नहीं होती तो अगले कुछ वर्षो में देश की अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो सकती थी। वर्ष 2000 के बाद से जिस अनुपात में पांच सौ व हजार के नोटों को छापना पड़ रहा था, उस अनुसार वर्ष 2025 तक इन नोटों की संख्या 30 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा हो जाती। यानि यह नोट देश की कुल कैश करेंसी के 94 फीसद हो जाते। ऐसे में फिर चाहकर भी कोई सरकार नोटबंदी नहीं कर सकती थी।

अनिल बोकिल टीम के अहम सदस्य व बड़े अर्थशास्त्री आदर्श धवन ने कहा कि जिस समय मोदी सरकार ने नोटबंदी का फैसला लिया, उस वक्त पांच सौ व हजार के नोटों की संख्या देश के कुल करेंसी की 86 फीसद तक पहुंच चुकी थी। यानि वर्ष 2016 में पांच सौ व एक हजार के नोटों की संख्या 14 लाख 18 हजार करोड़ हो गई थी, जबकि वर्ष 2000 में इन नोटों की संख्या मात्र 56 हजार करोड़ रुपये थी। पिछले 15 वर्षो में करीब 90 हजार करोड़ रुपये प्रति वर्ष की दर से सरकार को पांच सौ व एक हजार के नोट छापने पड़ रहे थे। पिछले 15 वर्षो में साढ़े तेरह लाख करोड़ रुपये से अधिक पांच सौ व हजार के नए नोट छापने पड़े थे। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2000 से 2016 के बीच इन नोटों की संख्या इस अनुपात में बढ़ी है।

वर्ष – पांच सौ व हजार के नोट

2000 56 हजार करोड़

2005 02 लाख 47 हजार करोड़

2010 07 लाख 48 हजार करोड़

2015 14 लाख 18 हजार करोड़

2025 30 लाख करोड़(अनुमानित)

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2025 तक 22 फीसद से अधिक हो जाती महंगाई की दर :

इसी अनुपात में यदि सरकार नोट छापती रहती तो वर्ष 2025 तक महंगाई की दर 22 फीसद तक पहुंच सकती थी। इतिहास गवाह है कि अब तक जितने देशों में महंगाई की दर ने 16 से 18 फीसद का आंकड़ा पार किया है, उसकी अर्थव्यवस्था को बर्बाद होने से कोई नहीं रोक सका। भारत भी उसी कगार पर खड़ा था। अगले दो-तीन वर्षो में भारत में महंगाई इतनी अधिक अनियंत्रित हो जाती कि देश को बर्बाद होने से कोई नहीं रोक सकता था।

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16 फीसद से अधिक महंगाई दर के बाद ये देश हुए बर्बाद :

वेनेजुएला ने हाल ही में अपने यहां भारत के बाद नोटबंदी की। यहां महंगाई दर 57 फीसद तक पहुंच जाने से अर्थव्यवस्था चौपट हो गई थी। अर्जेन्टीना की अर्थव्यवस्था वर्ष 2013 में महंगाई दर 21 फीसद तक पहुंचने से डांवाडोल होने लगी थी। इसके बाद मुद्रा अवमूल्यन करना पड़ा। इराक में महंगाई दर 17 फीसद पहुंचने से अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई है। वहीं 80 के दशक में महंगाई दर 24 फीसद पहुंचने के बाद रूस आर्थिट रूप से पंगु हो गया था।

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जाली नोट देश को कर रहे थे खोखला : पंजाब, कश्मीर, नेपाल व बंगलादेश के रास्ते देश में पांच सौ व एक हजार के सबसे ज्यादा जाली नोट आ रहे थे। देश की 80 फीसद जाली मुद्रा इन्हीं चार प्रमुख रास्तों से आती थीं। पश्चिम बंगाल का मालदा जिला जाली नोटों की राजधानी कहा जाने लगा था। यहां प्रतिवर्ष दो करोड़ से अधिक की जाली मुद्रा पकड़ी जाती रही है। नोटबंदी के बाद इन इलाकों में जीवन ठप सा हो गया है। यह देश के लिए अच्छा संकेत है।

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