बरेली के मौलवियों ने देखिये क्या कहा , इस पर भी समस्या

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हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश की इजाजत का ऐतिहासिक फैसला हाईकोर्ट ने आखिरकार सुना ही दिया। इस फैसले को सुनाते हुए कोर्ट ने इसे संवेदनशील मसला भी बताया। इस मसले पर जमकर सियासत हुई। याचिकाकर्ताओं ने जहां इस फैसले पर खुशी जताई तो हाजी अली ट्रस्ट ने इसे दूसरे के घर में घुसने की हरकत करार दिया। हाजी अली दरगाह के ट्रस्टी मुफ्ती मंजूर जिआई ने तो ये तक कह दिया कि ये ‘इस्लामिक संविधान’ के खिलाफ है। मैंने उनसे पूछा भाई ये इस्लामिक संविधान क्या होता है? देश में एक संविधान है और सबके लिए समान है। जाहिर तौर पर कोर्ट ने पूरे मामले को समझते हुए जिम्मेदारी के साथ फैसला लिया। आप किसी परंपरा को बचाए रखने के नाम पर क्या करते हैं, वो सामाजिक मसला है, लेकिन जब कानून के आधार पर बात होगी तो देश में इस तरह की कई परंपराओं को कचरे की टोकरी में डालना ही होगा।
भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की मध्य प्रदेश इकाई की संयोजक सफिया अख्तर से भी बात हुई। सफिया ने इसे सभी महिलाओं की जीत करार देते हुए कहा कि महिलाओं को बराबर का अधिकार मिलना ही चाहिए। हमें पहले से ही भरोसा था कि कोर्ट का फैसला हमारे पक्ष में आएगा। वहीं उनके वकील फिरोज ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में भी इसी आधार पर बहस होगी और निश्चित ही वहां भी फैसला हमारे ही पक्ष में आएगा। हाजी अली दरगाह ट्रस्ट इस फैसले से बौखलाया हुआ है और वो कोर्ट के फैसले को गलत तक करार दे रहा है।
हाजी अली पर बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, दरगाह ट्रस्ट का बेतुका बयान, फैसल ‘इस्लामिक संविधान’ के खिलाफ हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश की इजाजत का ऐतिहासिक फैसला हाईकोर्ट ने आखिरकार सुना ही दिया। इस फैसले को सुनाते हुए कोर्ट ने इसे संवेदनशील मसला भी बताया…

ट्रस्टी जिआई के मुताबिक ये हमारे घर में घुसने की कोशिश है। वो इस मुद्दे को सियासी रंग देने से भी नहीं चूक रहे हैं। वहीं इस्लाम के जिन जानकारों से बात हुई वो भी घुमा फिराकर बात करते दिखे। मौलान निजामी के मुताबिक इस्लाम महिला पुरुषों को बराबर का अधिकार देता है लेकिन हर धर्म स्थल के अपने तौर तरीके होते हैं और उनका सम्मान होना चाहिए। वो कोर्ट के फैसले से सहमत होने की बात तो कहते हैं लेकिन इस फैसले का स्वागत करने से इंकार करते हैं। ये मामला इस्लाम से जोड़ने की कोशिश भी की जा रही है लेकिन पहले भी इस्लाम के कई जानकार कह चुके हैं कि जब इस्लाम में दरगाह पर जाना ही हराम है तो फिर वहां स्त्री पुरुष के जाने पर क्या बहस की जाए।

हाल ही में तृप्ति देसाई ने शनि शिंगणापुर को लेकर एक संघर्ष किया था उन्हें इसमें जीत भी मिली और उन्होंने आखिरकार गर्भ गृह में पहुंचकर शनिदेव को स्नान भी करवाया। अब बारी हाजी अली दरगाह की है। कोर्ट का फैसला आ गया है लेकिन अब हाजी अली में क्या इस फैसले के बावजूद महिलाओं का प्रवेश संभव हो पाएगा? ये सवाल दरगाह ट्रस्ट के कड़े रुख के बाद उठ रहा है। ट्रस्ट कोर्ट के आदेश के खिलाफ ही खड़ा हा गया है और इस्लामिक संविधान की बात कर रहा है। सबसे पहले तो उनके इस बयान को गंभीरत से लेना चाहिए। ये समानता की लड़ाई को धार्मिक रंग देने की एक कोशिश भी है। देश कानून से चलता है और वो सबके लिए बराबर है। बॉम्बे हाइकोर्ट के इस फैसले ने ये भी साफ कर दिया है कि कानून सबके लिए बराबर वो दरगाह और मंदिर के लिए अलग अलग नहीं हो सकता।

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